Critical Minerals- क्रिटिकल मिनरल्स के लिए चीन पर नहीं रहना होगा निर्भर, भारत ने बनाया मास्टरप्लान
- byJitendra
- 24 Jun, 2026
दोस्तो क्रिटिकल मिनरल्स इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और स्मार्टफ़ोन से लेकर विंड टर्बाइन, सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम तक रीढ़ बन गए हैं। सालों से, चीन का इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सेक्टर पर दबदबा रहा है और वह ग्लोबल सप्लाई और प्रोसेसिंग के एक बड़े हिस्से को कंट्रोल करता है। लेकिन अब भारत अब इस निर्भरता को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठा रहा हैं, आइए जानते हैं इसके बारे में
क्वाड देशों ने $20 बिलियन की पहल शुरू की
एक अहम घटनाक्रम में, क्वाड देशों—भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान—ने नई दिल्ली में $20 बिलियन के 'क्वाड क्रिटिकल मिनरल्स इनिशिएटिव फ्रेमवर्क' को अंतिम रूप दिया है। इस पहल का मकसद माइनिंग, प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग और रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करके ग्लोबल सप्लाई चेन को मजबूत करना है।

इसका लॉन्ग-टर्म लक्ष्य वैकल्पिक सप्लाई नेटवर्क बनाना और भारत को क्रिटिकल मिनरल्स के लिए एक भरोसेमंद ग्लोबल हब के तौर पर स्थापित करना है।
चीन के दबदबे को चुनौती देने की रणनीति
चीन अभी दुनिया की लगभग 80% क्रिटिकल मिनरल रिफाइनिंग क्षमता को कंट्रोल करता है और परमानेंट मैग्नेट (स्थायी चुंबक) के प्रोडक्शन में उसकी हिस्सेदारी लगभग 94% है। परमानेंट मैग्नेट EVs, रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी और डिफेंस इक्विपमेंट में इस्तेमाल होने वाला एक अहम कंपोनेंट है।
2023 में, चीन ने कई क्रिटिकल मिनरल्स के एक्सपोर्ट पर पाबंदियां लगाईं, जिससे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में चिंता बढ़ गई। एक ही देश पर निर्भर रहने के जोखिमों को देखते हुए, क्वाड देशों के नेताओं ने अलग-अलग स्रोतों से सप्लाई (डायवर्सिफाइड) और सुरक्षित सप्लाई चेन की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पूरी वैल्यू चेन—खोज और माइनिंग से लेकर प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग तक—में सहयोग के महत्व पर ज़ोर दिया है।
भारत ने ग्लोबल पार्टनरशिप बढ़ाई
सरकारी कंपनी KABIL ने जनवरी 2024 में अर्जेंटीना में अपना पहला विदेशी लिथियम माइनिंग एग्रीमेंट साइन किया।
प्रधानमंत्री की जापान यात्रा के दौरान भारत और जापान ने क्रिटिकल मिनरल्स पर एक अहम एग्रीमेंट साइन किया।
ऑस्ट्रेलिया के साथ लिथियम और कोबाल्ट प्रोजेक्ट्स पर बातचीत में तेज़ी आई है।
भारत ने 1 जून को म्यांमार के साथ रेयर अर्थ मिनरल्स पर भी अहम बातचीत की।
ये कोशिशें मजबूत और अलग-अलग स्रोतों वाली मिनरल सप्लाई चेन बनाने की भारत की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।

प्रोसेसिंग सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है
हालांकि मिनरल रिसोर्स हासिल करना महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग भारत के लिए सबसे बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं।
आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए ₹34,300 करोड़ का मिशन
इन चुनौतियों से निपटने के लिए, सरकार ने जनवरी 2025 में ₹34,300 करोड़ के 'नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन' को मंज़ूरी दी।
इस मिशन के तहत प्रमुख पहलों में शामिल हैं:
देश में खोज और खनन गतिविधियों का विस्तार।
रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास।
चार राज्यों में 'रेयर अर्थ कॉरिडोर' की स्थापना।
राजस्थान, गुजरात, असम और अन्य क्षेत्रों में खनिजों के नए भंडार का पता लगाने के लिए जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) द्वारा एडवांस्ड टेक्नोलॉजी का ज़्यादा इस्तेमाल।
भारत के लिए ग्लोबल विकल्प बनने का मौका
किसी भी देश के लिए ज़रूरी खनिजों (critical minerals) के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर होना मुश्किल है। हालांकि, लगातार निवेश, तकनीकी प्रगति और 'क्वाड' (Quad) फ्रेमवर्क के ज़रिए मज़बूत साझेदारी से, भारत के पास अगले दशक में चीन के एक भरोसेमंद विकल्प के तौर पर उभरने का बड़ा मौका है।






